Friday, 21 September 2018

प्रेमचन्द युगीन हिंदी उपन्यास

प्रेमचन्द युगीन हिंदी उपन्यास


1.
मुंशी प्रेमचन्द

जन्मकाल – 31 जुलाई, 1880 ई. मृत्युकाल – 08 अक्टूबर, 1936 ई.
माता - आनंदी देवी पिता – अजायबराय
जन्मस्थान – लमही

प्रमुख उपन्यास –
 
1. सेवा सदन – 1918 ई. – यह उपन्यास पहले ‘बाज़ारे – हुस्न’ नाम से उर्दू में लिखा गया था, परन्तु ‘उर्दू’ में प्रकाशित नहीं करवाकर इसका हिंदी अनुवाद पहले प्रकाशित करवाया गया |
 
2. प्रेमाश्रय – 1922 ई. - यह उपन्यास पहले ‘गोशए- आफ़ियत’ नाम से उर्दू में लिखा गया था, परन्तु ‘उर्दू’ में प्रकाशित नहीं करवाकर इसका हिंदी अनुवाद पहले प्रकाशित हुआ |
 
3. रंगभूमि – 1925 ई. – यह उपन्यास भी पहले ‘चौगाने – हस्ती’ नाम से उर्दू में लिखा गया है, परन्तु इसका भी पहले हिंदी अनुवाद ही प्रकाशित हुआ | 

4. कायाकल्प – 1926 ई. 
5. निर्मला – 1927 ई.
6. गबन – 1931 ई. 
7. कर्मभूमि – 1933 ई.
8. गोदान – 1935 ई. 
9. मंगलसूत्र – अपूर्ण उपन्यास ( बाद में पुत्र ने पूर्ण किया )

विशेष तथ्य -


1. ये प्रारम्भ में नवाबराय नाम से उर्दू में लेखन कार्य करते थे | इनके उर्दू कहानी संग्रह ‘सोजे – वतन’ को अंग्रेज सरकार ने जब्त कर लिया | उसके बाद इन्होंने अपना नाम बदलकर प्रेमचन्द रख लिया | इनका मूल नाम धनपतराय था |

2 इन्हें ‘कलम का सिपाही’ और ‘कलम का मजदूर’ भी कहा जाता है |

 

2. जयशंकर प्रसाद


प्रमुख उपन्यास -
 
1 कंकाल – 1929 ई. 
2 तितली – 1934 ई. 
3 इरावती -1938 ई. (अपूर्ण)

विशेष तथ्य -


1 ‘तितली’ इनका आदर्शपरक उपन्यास है |
2 ‘कंकाल’ यथार्थपरक उपन्यास है |
 

3. विश्वंभरनाथ शर्मा ‘कौशिक’


प्रमुख उपन्यास

1. माँ – 1929 ई. 
2. भिखारिणी - 1929 ई. 
3. संघर्ष – 1945 ई.

विशेष तथ्य -

1. ये रसिक स्वभाव के मनमौजी रचनाकार थे |
2. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी इनके प्रेरणास्रोत माने जाते हैं |

4. आचार्य चतुरसेन शास्त्री


इन्होंने लगभग तीन दर्जन उपन्यास लिखे हैं | ‘वैशाली की नगरवधू’ इनका सर्वप्रसिद्ध उपन्यास है | इसमें व्यक्ति – स्वातन्त्र्य की समस्या उठाई गई है |

इनके प्रमुख उपन्यास निम्न हैं –

1 ह्रदय की परख – 1918 ई. 
2 ख्वास का ब्याह – 1927 ई.
3 अमर अभिलाषा- 1932 ई. 
4 आत्मदाह – 1937 ई.
5 मंदिर की नर्तकी – 1939 ई. 
6 नीली माटी – 1940 ई.
7 पूर्णाहुति – 1947 ई. 
8 वैशाली की नगरवधू – 1948 ई.
9 सोना और खून -1960 ई. 
10 आकाश की छाया में -1961 ई.
 

5. पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’

जन्म – 1901 ई. , चुनार , मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)
प्रमुख उपन्यास -

1 चंद हसीनों के खतूत – 1927 ई. 
2 दिल्ली का दलाल - 1927 ई.
3 बुधुआ की बेटी – 1928 ई. 
4 शराबी – 1930 ई.
5 सरकार तुम्हारी आँखों में – 1931 ई. 
6 कला का पुरस्कार – 1955 ई.
7 कढ़ी में कोयला – 1955 ई. 
8 फागुन के दिन चार – 1960 ई.

6. वृन्दावन लाल वर्मा (1884 – 1969 ई.)


प्रमुख उपन्यास -

1 संगम – 1928 ई. 
2 लगन – 1929 ई.
3 प्रत्यागत – 1929 ई. 
4 विराटा की पद्मिनी – 1936 ई.
5 मुसाहिब जू – 1946 ई. 
6 मृगनयनी – 1950 ई. (सर्वश्रेष्ठ उपन्यास )
7 अमरबेल – 1953 ई. 
8 टूटे काँटे – 1954 ई.

7. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’


प्रमुख उपन्यास -

1 अप्सरा – 1931 ई. 
2 अलका - 1931 ई.
3 निरुपमा – 1936 ई.
4 प्रभावती -1936 ई.

 

8. सियारामशरण गुप्त


प्रमुख उपन्यास -

1 गोद – 1932 ई. 
2 अंतिम आकांक्षा – 1934 ई.
3 नारी – 1937 ई.

9. राहुल सांकृत्यायन ( 1893 – 1963 ई. )

मूल नाम – केदार पाण्डेय

प्रमुख उपन्यास -

1 शैतान की आँख – 1923 ई. 
2 विस्मृति के गर्भ में – 1923 ई.
3 सोने की ढाल – 1923 ई. 
4 जीने के लिए - 1940 ई.
5 मधुर स्वप्न – 1949 ई. 
6 विस्मृत यात्री – 1954 ई.

10. श्रीनाथ सिंह


प्रमुख उपन्यास -
 
1 उलझन – 1934 ई. 
2 जागरण – 1937 ई.
3 प्रभावती – 1941 ई. 
4 प्रजामंडल – 1941 ई. 

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Pragativadi Kavi [ प्रगतिवादी काव्य धारा के प्रमुख कवि ]

Pragativadi Kavi
[ प्रगतिवादी काव्य धारा के प्रमुख कवि ]


प्रगतिवाद – 

राजनीति के क्षेत्र में जो विचारधारा ‘साम्यवाद’ या ‘मार्क्सवाद’ के नाम से जानी जाती है , साहित्य के क्षेत्र में वही विचारधारा ‘प्रगतिवाद’ के नाम से जानी जाती है |अर्थात् साम्यवादी विचारधारा के अनुरूप लिखा गया काव्य ही ‘प्रगतिवादी काव्य’ कहलाता है |

‘कार्ल मार्क्स’ को ही ‘प्रगतिवाद’ का भी आदि प्रवर्तक माना जाता है |

डॉ. नगेन्द्र के अनुसार – “ प्रगतिवादी काव्य की संज्ञा उस काव्य को दी गई जो छायावाद के समाप्तिकाल में 1936 ई. के आसपास से सामाजिक चेतना को लेकर निर्मित होना आरंभ हुआ |”

प्रगतिवाद ‘सामाजिक यथार्थवाद’ के नाम से भी पुकारते हैं |


प्रगतिवादी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ -
1 मार्क्सवाद व साम्यवाद का समर्थन

2 शोषण का विरोध एवं शोषितों के प्रति सहानुभूति की भावना

3 धर्म और ईश्वर का विरोध

4 नारी के सम्मान की प्रतिष्ठा
5 सामाजिक अन्धविश्वासो व रुढियों का खंडन
6 सामजिक भावना का चित्रण
7 ठोस यथार्थ का चित्रण
8 विश्व बंधुत्व की भावना
9 कला के प्रति नवीन दृष्टिकोण
10 युगानुकूल परिवर्तन एवं नव निर्माण की उत्कट लालसा

प्रगतिवाद के प्रमुख कवि

1 नागार्जुन

जन्मकाल – 1911 ई. ( 30 जून , 1911 ई. )
मृत्युकाल – 1998 ई. ( 5 नवम्बर, 1998 ई. )
जन्मस्थान – सतलखा , जिला – दरभंगा
मूल नाम – वैद्यनाथ मिश्र

प्रमुख रचनाएँ -
1 युगधारा – 1953 ई.
2 सतरंगे पंखों वाली – 1959 ई.
3 प्यासी पथराई आँखें – 1962 ई.
4 तुमने कहा था – 1980 ई.
5 खिचड़ी विप्लव देखा हमने – 1980 ई.
6 हजार – हजार बाहों वाली – 1981 ई.
7 पुरानी जूतियों का कोरस – 1983 ई.
8 रवीन्द्र के प्रति
9 प्रेत का बयान
10 आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने

उपन्यास
1 रतिनाथ की चाची
2 वरुण के बेटे
3 दुःखमोचन
4 कुंभीपाक

विशेष तथ्य -
1 नागार्जुन मैथिली में ये यात्री के नाम से लिखते रहे तथा हिंदी में इन्हें बाबा नागार्जुन के नाम से जाना जाता है |

2 ये दीपक पत्रिका के सम्पादक रहे |

3 अन्याय , शोषण एवं अत्याचार के विरोधी , मजदूरों के हिमायती

4 व्यंग्यपरक रचनाओं के कुशल शिल्पी |

2. केदारनाथ अग्रवाल

जन्मकाल – 1911 ई.
मृत्युकाल – 2000 ई.
जन्मस्थान – ग्राम – कमासिन , जिला – बांदा ( उ. प्र.)

प्रमुख रचनाएँ -
1 नींद के बादल – 1947 ई.
2 युग की गंगा – 1947 ई.
3 लोक और अलोक – 1957 ई.
4 फूल नहीं रंग बोलते हैं – 1965 ई.
5 आग का आईना – 1970 ई.
6 पंख और पतवार -1979 ई.
7 हे मेरी तुम – 1981 ई.
8 कहे केदार खरी – खरी 1983 ई.
9 बंबई का रक्तस्नान -1983 ई.
10 जमुन जल तुम – 1984
11 बोले – बोले अबोल – 1985
12 जो शिलाएं तोड़ते हैं – 1985
13 आत्मगंध

विशेष तथ्य -
1 ये पेशे से वकील थे |

2 साम्यवाद के प्रति दृढ़ आस्था |

3 सच्चे जनवादी कवि

4 इन्हें ‘सोवियत भूमि पुरस्कार’ एवं ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ प्राप्त हुआ था |

3. डॉ रामविलास शर्मा

जन्मकाल – 1912 ई.
मृत्युकाल – 2000 ई.
जन्मस्थान – ग्राम – ऊँच , जिला – उन्नाव (उ. प्र.)

प्रमुख रचनाएँ -
1 रूप तरंग – 1956 ई.
2 सदियों के सोये जाग उठे – 1988 ई.
3 इस अकाल वेला में – 1988
4 बुद्ध वैराग्य तथा प्रारम्भिक कविताएँ – 1997
5 ऋतु संहार

विशेष तथ्य -
1 ये कवि के बजाय एक श्रेष्ठ गद्यकार के रूप में प्रसिद्ध हुए हैं |

2 ‘निराला की साहित्य साधना’ ( जीवनी ) के लिए इनको 1970 ई. में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला |

4. शिवमंगलसिंह सुमन

जन्मकाल – 1915 ई.
मृत्युकाल – 2002 ई.

प्रमुख रचनाएँ -
1 हिल्लोल
2 जीवन के गान
3 प्रलय सृजन
4 पर आँखें नहीं भरी
5 विन्ध्य हिमाचल
6 एशिया जाग उठा
7 वाणी की व्यथा
8 मिट्टी की बारात

विशेष तथ्य -
1 गाँधी की अपेक्षा मार्क्सवाद के समर्थक हैं |

2 शोषण व अन्याय का विरोध उनकी रचनाओं में है |

3 ‘मिट्टी की बारात’ रचना के लिए 1974 ई. में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था |

5. रांगेय राघव

जन्मकाल – 1923 ई.
मृत्युकाल – 1962 ई.

प्रमुख रचनाएँ -
1 अजेय खंडहर – 1944 ई.
2 पिघलते पत्थर – 1946 ई.
3 राह के दीपक – 1947 ई.
4 मेधावी – 1947 ई.
5 पांचाली – 1955 ई.

विशेष तथ्य -
1 इनका मूल नाम ‘त्र्यंबक वीर राघवाचार्य’ था |
2 ‘पिघलते पत्थर’ इनकी मुक्तक काव्य रचना है |
3 ‘मेधावी’ और ‘पांचाली’ आख्यानक रचनाएँ हैं |

6. त्रिलोचन शास्त्री

जन्मकाल – 1915 ई.
मृत्युकाल – 2002 ई.

प्रमुख रचनाएँ -
1 धरती – 1945 ई.
2 दिगंत – 1957 ई.
3 काव्य और अर्थबोध
4 गुलाब और बुलबुल
5 मैं उस जनपद का कवि हूँ
6 ताप के तापे हुए दिन
7 शब्द

विशेष तथ्य -
1 ये जीवन में निहित मंद लय के कवि हैं |

2 ‘ताप के तापे हुए दिन’ रचना के लिए 1981 ई. में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था |

3 इन्होंने हिंदी के अनेक शब्द कोशों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है |

प्रगतिवादी काव्यधारा के अन्य कवि -

1 डॉ पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’

रचनाएँ – 
1 तू युवक है – 1949 ई.
2 दूब के आँसू – 1952 ई.
3 धरती पर उतरो -1952 ई.

2. शंकर शैलेन्द्र

रचनाएँ – 
1 न्यौता और चुनौती

3. चन्द्र देव शर्मा

रचनाएँ – 
1 पंडितजी गजब हो रहा है

4. गणपति चन्द्र भंडारी

रचनाएँ – 
1 रक्तदीप

5. विजय चन्द्र

रचनाएँ – 
1 चेहरे
2 जंग लगे सपने
3 वेश्या

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Prayogvad Ki Visheshta [प्रयोगवादी काव्यधारा के प्रमुख कवि]

Prayogvad Ki Visheshta
[प्रयोगवादी काव्यधारा के प्रमुख कवि] 

प्रयोगवाद की परिभाषा

डॉ नगेन्द्र के अनुसार – हिंदी साहित्य में ‘प्रयोगवाद’ नाम उन कविताओं के लिए रूढ़ हो गया है , जो कुछ नये भावबोधों , संवेदनाओं तथा उन्हें प्रेषित करने वाले शिल्पगत चमत्कारों को लेकर शुरू – शुरू में तार – सप्तक के माध्यम से सन 1943 ई. में प्रकाशन जगत में आई और जो प्रगतिशील कविताओं के साथ विकसित होती गयी तथा जिनका समापन नई कविता में हो गया |

प्रयोगवाद के संदर्भ में विशेष तथ्य


1 इस काव्यधारा की कविताओं को ‘प्रयोगवाद’ नाम सर्वप्रथम आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी ने अपने एक निबंध ‘प्रयोगवादी रचनाएँ’ में प्रदान किया था |
2 आगे चलकर प्रयोगवाद का ही विकास नयी कविता के नाम से हुआ था |
3 ‘लोक कल्याण की उपेक्षा’ प्रयोगवाद का सबसे बड़ा दोष माना जाता है |
4 प्रयोगवादी कवि यथार्थवादी हैं | वे भावुकता के स्थान पर ठोस बौद्धिकता को स्वीकार करते हैं |

प्रयोगवादी काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ

1 अतियथार्थवादिता
2 बौद्धिकता की अतिशयता
3 घोर वैयक्तिकता
4 वाद व विचारधारा का विरोध
5 नवीन उपमानों का प्रयोग
6 निराशावाद
7 साहस और जोखिम
8 व्यापक अनास्था की भावना
9 क्षणवाद
10 सामजिक यथार्थवाद की भावना

प्रगतिवाद व प्रयोगवाद में मुख्य अंतर
1 ‘प्रगतिवादी कविता’ में शोषित वर्ग / निम्न वर्ग को केंद्र में रखा गया है , जबकि ‘प्रयोगवादी कविता’ में स्वयं के जीये हुए यथार्थ जीवन का चित्रण होता है |
2 प्रगतिवादी कविता ‘विचारधारा को महत्त्व’ देती है , जबकि प्रयोगवादी कविता ‘अनुभव को महत्त्व’ देती है |
3 प्रगतिवादी कविता में सामाजिक भावना की प्रधानता दिखाई देती है , जबकि प्रयोगवादी कविता में व्यक्तिगत भावना की प्रधानता दिखाई देती है |
4 प्रगतिवादी कविता में ‘विषयवस्तु को अधिक महत्त्व’ दिया गया है , जबकि प्रयोगवादी कविता में ‘कलात्मकता को अधिक महत्त्व’ दिया गया है |

प्रयोगवादी काव्यधारा के प्रमुख कवि


1. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय

जन्मकाल – 1911 ई. ( 7 मार्च, 1911 )
मृत्युकाल – 1987 ई. ( 4 अप्रेल, 1987 )
जन्मस्थान – ग्राम – कसिया , जिला – देवरिया

प्रमुख रचनाएँ -
(क) काव्यात्मक रचनाएँ –
1 भग्नदूत -1933 ई.
2 चिंता – 1942 ई.
3 इत्यलम – 1946 ई.
4 हरी घास पर क्षण भर – 1949 ई.
5 बावरा अहेरी – 1954 ई.
6 इंद्रधनु रौंदे हुए – 1957 ई.
7 अरी ओ करुणा प्रभामय – 1959 ई.
8 आँगन के पार द्वार – 1961 ई.
9 कितनी नावों में कितनी बार

(ख) कहानी संग्रह –
1 परम्परा
2 त्रिपथगा
3 जयदोल
4 कोठरी की बात
5 शरणार्थी
6 मेरी प्रिय कहानियाँ

(ग) उपन्यास –
1 शेखर एक जीवनी
2 नदी के द्वीप
3 अपने – अपने अजनबी

विशेष तथ्य -
1 ‘आँगन के पार द्वार’ रचना के लिए इनको 1964 ई. में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ प्राप्त हुआ था |
2 ‘कितनी नावों में कितनी बार’ रचना के लिए इनको 1978 ई. में ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार’ प्राप्त हुआ था |
3 बावरा – अहेरी इनके जीवन दर्शन को प्रतिबिंबित करने वाली रचना है |
4 हिंदी साहित्य में इनको ‘कठिन गद्य का प्रेत’ भी कहा जाता है |
5 इनको व्यष्टि चेतना का कवि भी कहा जाता है |

2. भवानी प्रसाद मिश्र

जन्मकाल – 1914 ई.
मृत्युकाल – 1985 ई.
जन्मस्थान – ग्राम – टिमरणी , जिला – होशंगाबाद

प्रमुख रचनाएँ -
1 गीत फरोश
2 सतपुड़ा के जंगल
3 चकित है दुःख
4 टूटने का सुख
5 त्रिकाल संध्या
6 अनाम तुम आते हो
7 कालजयी
8 फसलें और फूल
9 बुनी हुई रस्सी
10 सन्नाटा
11 वाणी की दीनता

विशेष तथ्य
1. इनकी सहज भाषा को देखकर गाँधी जी के चरखे की सहजता का आभास होता है , जिसके कारण इनको ‘कविता का गाँधी’ भी कहा जाता है |
2. मध्य प्रदेश सरकार ने इनको ‘शिखर सम्मान’ प्रदान किया गया था |
3. ‘बुनी हुई रस्सी’ रचना के लिए इनको 1972 ई. में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ प्राप्त हुआ था |

3. गजानन माधव ‘मुक्तिबोध


जन्मकाल – 1917 ई.
मृत्युकाल – 1964 ई.
जन्मस्थान – श्योपुर (ग्वालियर )

प्रमुख रचनाएँ -
(क) काव्य संग्रह
1 चाँद का मुँह टेढ़ा है – 1964 ई.
2 भूरी – भूरी खाक धूल – 1980 ई.

(ख) प्रसिद्ध कविताएँ
1 अंधेरे में
2 ब्रह्मराक्षस
3 पूँजीवाद समाज के प्रति
4 दिमागी गुहांधकार

(ग) गद्य रचना
1 भारत : इतिहास और संस्कृति ( मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 19 सितम्बर, 1962 ई. को इस पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था | )

विशेष तथ्य –
1 इनकी कविताओं को ‘स्वाधीन भारत का इस्पाती ढाँचा’ कहा जाता है |
2 इनको ‘तीव्र इन्द्रिय बोध का कवि’ , ‘भयानक ख़बरों का कवि’ एवं ‘फैंटेसी का कवि’ भी कहा जाता है |

4 गिरिजा कुमार माथुर

जन्मकाल – 1918 ई.
मृत्युकाल – 1994 ई.
जन्मस्थान – अशोकनगर (मध्य प्रदेश)

प्रमुख रचनाएँ -

1 मंजीर
2 नाश और निर्माण
3 धूप के धान
4 शिलापंख चमकीले
5 छाया मत छूना मन
6 भीतरी नदी की यात्रा
7 साक्षी रहे वर्तमान
8 मैं वक्त के हूँ सामने
9 मुझे और अभी कहना है

विशेष तथ्य -
1 ये रोमानी मिज़ाज के कवि माने जाते हैं |
2 ये ‘हम होंगे कामयाब , हम होंगे कामयाब’ गीत के रचनाकार हैं |
3 ‘मैं वक्त के हूँ सामने’ रचना के लिए इनको1991 ई. में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला |

5. धर्मवीर भारती

जन्मकाल – 1926 ई.
मृत्युकाल – 1997 ई.
जन्मस्थान – इलाहाबाद

प्रमुख रचनाएँ -
1 ठंडा लोहा – 1952 ई.
2 सात गीत वर्ष – 1959 ई.
3 अंधा युग (गीतिनाट्य)
4 कनुप्रिया
5 सपना अभी भी – 1993

प्रसिद्ध कविताएँ -
1 प्रमथ्यु गाथा
2 सृष्टि का आखिरी आदमी
3 देशांतर
4 टूटा पहिया

विशेष तथ्य -
1 ये 1987 ई. तक ‘धर्मयुग’ पत्रिका के सम्पादक रहे |
2 आपके द्वारा रचित ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ रचना पर एक टी वी धारावाहिक भी प्रसारित हुआ था |

6 नरेश मेहता

जन्मकाल – 1922 ई.

प्रमुख रचनाएँ -

1 वनपांखी सुनो
2 बोलने दो चीड़ को
3 मेरा समर्पित एकांत उत्सव
4 शबरी
5 महा प्रस्थान

7 शमशेर बहादुर सिंह

जन्मकाल – 1911 ई.
मृत्युकाल – 1993 ई.
जन्मस्थान – देहरादून

प्रमुख रचनाएँ -
1 अमन का राग
2 चुका भी नहीं हूँ मैं
3 इतने पास अपने
4 काल तुझसे होड़ मेरी
5 उदिता
6 बात बोलेगी हम नहीं

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Tuesday, 17 July 2018

Kavya Prayojan [ काव्य – प्रयोजन ]

Kavya Prayojan [ काव्य – प्रयोजन ]
Kavya Prayojan [ काव्य – प्रयोजन ]

प्रयोजन का अर्थ है उद्देश्य – कोई भी कार्य बिना प्रयोजन के नहीं किया जाता | माना जाता है कि - 
 “प्रयोजनं विना तु मन्दोऽपि न प्रवर्तते |” 

काव्य प्रयोजन के विषय में संस्कृत आचार्यों का मत 

1. आचार्य भरतमुनि के अनुसार – भरतमुनि ने अपने ग्रन्थ नाट्यशास्त्र में लिखा है – 
“धर्मं यशस्यं आयुष्यं हितं बुद्धिविवर्धनम् | लोकोपदेशजननं नाट्यमेतद् भविष्यति ||” 

अर्थात् एक नाटक (नाट्य काव्य ) लेखन के निम्न छह प्रयोजन माने जा सकते हैं – 
1 धर्म
2 यश
3 आयु
4 हित
5 बुद्धि का विकास
6 लौकिक ज्ञान

अन्य स्थान पर वे लिखते हैं – 
दु:खार्तानां श्रमार्तानां शोकार्तानां तपस्वीनाम् | विश्रान्तिजननं काले नाट्यमेतद् भविष्यति ||” 

अर्थात् दु:खार्त , श्रमार्त एवं शोकार्त व्यक्ति को सुख और शांति की प्राप्ति ही काव्य लेखन का प्रयोजन है | 

2. आचार्य भामह के अनुसार – भामह की रचना काव्यालंकार के अनुसार काव्य प्रयोजन है – 
“धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च | करोति कीर्तिं प्रीतिञ्च साधुकाव्य निबन्धनम् ||” 

अर्थात् आचार्य भामह ने काव्य के निम्न प्रयोजन स्वीकार किए हैं – 
1 पुरुषार्थ चतुष्टय ( धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष ) की प्राप्ति
2 कलाओं में निपुणता
3 कीर्ति (यश ) और प्रीति (आनंद ) की प्राप्ति |
3. आचार्य मम्मट के अनुसार – आचार्य मम्मट ने अपनी रचना ‘काव्यप्रकाश’ में काव्य प्रयोजनों को इस प्रकार व्यक्त किया है – 
“काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये | सद्यः परिनिर्वृत्त्ये कान्तासम्मितयोपदेशयुजे || 

मम्मट के अनुसार काव्य के छह प्रयोजन हैं , जो इस प्रकार हैं – 
1 यश प्राप्ति
2 अर्थ प्राप्ति
3 लोक व्यवहार का ज्ञान
4 अनिष्ट का निवारण
5 आत्मशांति
6 कान्तासम्मित उपदेश
1. यश प्राप्ति – काव्य लेखन से कवि को यश प्राप्त होता है और वह सदा के लिए अमर हो जाता है | 

2. अर्थ प्राप्ति – काव्य लेखन से कवि को अर्थ अर्थात् धन की प्राप्ति होती है | 

3. लोक व्यवहार का ज्ञान – इसका संबंध पाठकों से है अर्थात् एक श्रेष्ठ काव्य के पठन से पाठकों को मानवोचित शिक्षा प्राप्त होती है | 

4. अनिष्ट का निवारण – यहाँ ‘शिवेतर’ का अर्थ है – अमंगल और ‘क्षतये’ का अर्थ है – विनाश अर्थात् काव्य लेखन से कवि के एवं काव्य के पठन से पाठक के अनिष्ट का निवारण होता है | 

5. आत्म शांति – इसका संबंध मुख्यत: पाठक से है अर्थात् काव्य पठन से पाठक को पढ़ने के साथ ही आनंद का अनुभव होता है और उसे परम शांति की प्राप्ति होती है | 

6. कान्तासम्मित उपदेश – उपदेश तीन प्रकार के माने जाते हैं – 
(क) प्रभु सम्मित उपदेश – ऐसा उपदेश जो हमारे लिए हितकर तो होता है ,परन्तु रुचिकर नहीं होता , वह प्रभु सम्मित उपदेश कहलाता है |
(ख) मित्र सम्मित उपदेश – यह उपदेश हितकर भी होता है और रुचिकर भी ,परन्तु इसकी अवहेलना भी की जा सकती है |
(ग) कान्तासम्मित उपदेश - यह उपदेश हितकर भी होता है और रुचिकर भी होता है तथा इसकी कभी अवहेलना भी नहीं की जा सकती है | काव्य का उपदेश इसी श्रेणी का उपदेश माना जाता है |

4 आचार्य विश्वनाथ के अनुसार – विश्वनाथ ने अपने ग्रन्थ ‘साहित्यदर्पण’ में काव्य प्रयोजनों का विवेचन इस प्रकार किया गया है – 
“चतुर्वर्गफलप्राप्ति: सुखादल्पधियामपि | काव्यादेव यतस्तेन तत्स्वरूपं निरुप्यते ||” 

हिंदी कवियों का मत 

1. तुलसीदास – तुलसीदास ने ‘स्वान्त: सुखाय’ को साहित्य का उद्देश्य मानते हुए लिखा है – 
‘स्वान्त: सुखाय तुलसी रघुनाथा गाथा भाषा निबंध मतिमंजुल मातनोति |’ 

2. भिखारीदास – यश को काव्य का मुख्य प्रयोजन मानते हैं – 
एकन्ह को जसही सों प्रयोजन है रसखानि रहीम की नाई | 
दास कवित्तन्ह की चरचा बुधिवन्तन को सुख दै सब ठाई || 

इन्होंने काव्य के 5 प्रयोजन बताये हैं तप: पुंज का फल , संपत्ति लोभ , यशप्राप्ति , सहृदयों को आनंदोपलाब्धि तथा सुखपूर्वक शिक्षा की प्राप्ति | 

3. कुलपति मिश्र – आचार्य कुलपति मिश्र ने यश ,धन , आनंद और व्यवहार ज्ञान को काव्य का प्रयोजन बताया है | 

4. सोमनाथ – आचार्य सोमनाथ ने कीर्ति , धन , मनोरंजन , अनिष्टनाश और उपदेश को काव्य का प्रयोजन स्वीकार किया है | 

5 मैथिलीशरण गुप्त – राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने मनोरंजन और उपदेश को काव्य का प्रयोजन माना – 
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए | उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए || 

6. डॉ नगेन्द्र – नगेन्द्र की दृष्टि में काव्य के मूलत: 2 प्रयोजन हैं – आनंद और लोकमंगल , जिनमें सापेक्षिक मूल्य आनंद का ही अधिक है | 

7. डॉ गुलाबराय – गुलाबराय के मत में रसानंद ही जीवन का रस है | 

8. प्रेमचंद – साहित्य का उद्देश्य हमारी अनुभूति की तीव्रता को बढ़ाना है | 

पाश्चात्य चिंतकों के मत 

1. सुकरात – इनके अनुसार दैवी प्रेरणा काव्य की मूल प्रेरणा है | 

2. प्लेटो – प्लेटो लोकमंगल को काव्य का चरम लक्ष्य मानते हैं | 

3. अरस्तू – इनके अनुसार कला का विशिष्ट उद्देश्य आनंद है | यह अनैतिक नहीं हो सकता | 

4. होरेस – होरेस आनंद और लोककल्याण को ही काव्य का प्रयोजन स्वीकार करते हैं | 

5. मैथ्यू आर्नल्ड – इनकी दृष्टि में जीवन की व्याख्या करना ही काव्य का प्रयोजन है | 

6. ड्राइडन – इनके अनुसार स्वान्तः सुखाय और परजन हिताय काव्य के प्रयोजन हैं |

YouTube - (Coming on 18th July)



Monday, 16 July 2018

Kavya Hetu [ काव्य हेतु ]

kavya hetu

काव्य हेतु [ Kavya Hetu ]


‘हेतु’ का शाब्दिक अर्थ है कारण , अत: ‘काव्य हेतु’ का अर्थ हुआ काव्य की उत्पत्ति का कारण | किसी व्यक्ति में काव्य रचना की सामर्थ्य उत्पन्न कर देने वाले कारण काव्य हेतु कहलाते हैं | दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि काव्य ‘कार्य’ है और हेतु कारण है | 

भारतीय विद्वानों के अनुसार तीन काव्य हेतु माने गए हैं –
1 प्रतिभा ( जन्मजात गुण )
2 व्युत्पत्ति ( व्याकरणिक व साहित्यिक तत्वों का ज्ञान )
3 अभ्यास ( निरंतर अध्ययन )

काव्यहेतुओं का सर्वप्रथम विवेचन ‘अग्निपुराण’ में प्राप्त होता है | अग्निपुराण में निम्न हेतु दिए गए हैं – 
1 प्रतिभा
2 वेदज्ञान
3 लोक व्यवहार

जैसे – 
नरत्वं दुर्लभं लोक विद्या तत्र सुदुर्लभा |
कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा ||

अर्थात् लोक में नरत्व दुर्लभ है और उसमें विद्यावान नर होना दुर्लभ है | कवित्व दुर्लभ है और कविता करने की शक्ति (प्रतिभा) तो और भी दुर्लभ है | 

संस्कृत आचार्यों के अनुसार काव्य हेतु -

1. आचार्य भामह भामह के अनुसार गुरु के उपदेश से जड़ बुद्धि भी शास्त्र अध्ययन करने में समर्थ हो सकता है ,किन्तु काव्य तो किसी ‘प्रतिभाशाली’ द्वारा ही रचा जा सकता है | 
यथा – गुरुदेशादध्येतुं शास्त्रं जड़धिमोडप्यलम् |
काव्यं तु जायते जातु कस्यचित् प्रतिभावत: ||

स्पष्ट है कि भामह ‘प्रतिभा’ के साथ – साथ व्युत्पत्ति एवं अभ्यास को भी काव्य हेतुओं में स्थान देने के पक्षधर हैं |


2 आचार्य दण्डी – दण्डी ने अपने ग्रन्थ ‘काव्यादर्श’ में प्रतिभा , अभ्यास और लोकव्यवहार को काव्य हेतुओं के रूप में मान्यता दी है | उनकी मान्यता के अनुसार – 
नैसर्गिकी च प्रतिभा श्रुतं च बहुत निर्मलम् |
आनंदाश्चाभियोगो अस्या: कारणं काव्य सम्पदा ||

अर्थात् नैसर्गिक प्रतिभा , निर्मल शास्त्र , ज्ञान और बढ़ा – चढ़ा अभ्यास काव्य सम्पत्ति में कारण होते हैं | 


3. आचार्य वामन – वामन ने अपने ग्रन्थ ‘काव्यालंकार’ में प्रतिभा को जन्मजात गुण मानते हुए इसे प्रमुख काव्य हेतु स्वीकार किया गया है – 

“कवित्व बीजं प्रतिभानं कवित्वस्य बीजम् |”
प्रतिभा के अतिरिक्त वे लोकव्यवहार ,शास्त्रज्ञान, शब्दकोष आदि की जानकारी को भी काव्य हेतुओं में स्थान देते हैं | 


4. आचार्य रुद्रट ये प्रतिभा , व्युत्पत्ति व अभ्यास को काव्य के हेतु स्वीकार करते हैं | उनके अनुसार प्रतिभा के दो भेद हैं – 
1 सहजा ( जो कवियों में जन्मजात) तथा 2 उत्पाद्या ( लोकशास्त्र व अभ्यास से उत्पन्न ) होती है | 

5. आचार्य मम्मट मम्मट ने ‘काव्यप्रकाश’ में लिखा है – 

शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्र काव्याद्यवेक्षणात् |
काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे || 

अर्थात् काव्य के तीन हेतु हैं – शक्ति (प्रतिभा) लोकशास्त्र का अनवेक्षण तथा अभ्यास |दूसरे स्थान पर वे यह भी कहते हैं – ‘शक्ति’ काव्य का बीजसंस्कार है | 

6. पंडितराज जगन्नाथ इन्होंने ‘रसगंगाधर’ में ‘प्रतिभा’ को ही प्रमुख काव्य हेतु स्वीकार किया है – 
“ तस्य च कारणं कविगता केवलं प्रतिभा |” 


काव्य हेतुओं का स्वरूप

1. प्रतिभा प्रतिभा वह शक्ति है जो किसी व्यक्ति को काव्य रचना में समर्थ बनाती है |
राजशेखर के अनुसार प्रतिभा है – 
सा शक्ति: केवल काव्य हेतु: |

आचार्य वामन का मत है कि प्रतिभा जन्म से प्राप्त संस्कार है जिसके बिना काव्य रचना संभव नहीं है | 

आचार्य अभिनव गुप्त ने प्रतिभा की परिभाषा देते हुए लिखा है –

“प्रतिभा अपूर्व वस्तु निर्माण क्षमा प्रज्ञा:”


वक्रोक्ति संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य कुन्तक ने प्रतिभा उस शक्ति को माना है जो शब्द और अर्थ की अपूर्व सौन्दर्य की सृष्टि करती है | अनेक प्रकार के अलंकारों व उक्ति वैचित्र्य आदि का विधान करती है | 



आचार्य मम्मट ने प्रतिभा को एक नया नाम दिया | वे इसे ‘शक्ति’ कहते हैं और काव्य का बीज स्वीकार करते हैं जिसके बिना काव्य की रचना असंभव है | 

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है –
1 प्रतिभा काव्य का मूल हेतु है |
2 यह ईश्वर प्रदत्त शक्ति है |
3 प्रतिभा दो प्रकार की होती है – 
1 कारयित्री प्रतिभा और 2 भावयित्री प्रतिभा |

(क) कारयित्री प्रतिभा वह होती है जिसके बल पर कवि कविता लिखता है | 
(ख) भावयित्री प्रतिभा वह होती है जिसके बल पर कोई पाठक कविता को समझाता है | 

2. व्युपत्ति – इसका शाब्दिक अर्थ है – निपुणता , पाडित्य या विद्वता | ज्ञान की उपलब्धि को भी व्युपत्ति कहा गया है | संस्कृत आचार्यों ने व्युपत्ति को काव्य हेतुओं में दूसरा स्थान दिया है | व्युत्पत्ति के बल पर ही कोई व्यक्ति यह निर्णय कर पाता है कि किस स्थान पर किस शब्द का प्रयोग उचित होगा | सच तो यह है कि प्रतिभा और व्युपत्ति समवेत रूप से ही काव्य के हेतु हैं | 

हिंदी आचार्य राजशेखर के अनुसार – उचितानुचित विवेकौ व्युपत्ति: अर्थात् उचित – अनुचित का विवेक ही व्युपत्ति है | 

3. अभ्यास - काव्य निर्माण का तीसरा हेतु अभ्यास है | भामह ने लिखा है कि शब्दार्थ के स्वरूप का ज्ञान करके सतत अभ्यास द्वारा उसकी उपासना करनी चाहिए , साथ ही अन्य कवियों के कृतित्व का अध्ययन भी करना चाहिए | आचार्य वामन ने भी अभ्यास को महत्त्व देते हुए लिखा है – 

‘अभ्यासेन हि कर्मसु कौशलं भावहिति |’ 
अर्थात् अभ्यास के द्वारा ही कवि कर्म में कुशलता प्राप्त की जा सकती है | 

आचार्य दण्डी ने तो अभ्यास को ही काव्य का हेतु माना है | हिंदी आचार्यों ने अभ्यास के महत्त्व को निम्न शब्दों में स्वीकारा है – 

करत – करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान | 
रस आवत जात तें सिल पर परत निसान |

सम्पूर्ण विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रतिभा , व्युत्पत्ति और अभ्यास ही काव्य के हेतु हैं ; किन्तु प्रतिभा सर्वप्रमुख है जिसे व्युपत्ति व अभ्यास से निरंतर निखारा जा सकता है | 

हिंदी आचार्यों के अनुसार काव्य हेतु -

1. रामचन्द्र शुक्ल – शुक्ल जी ने प्रतिभा को काव्य का मुख्य हेतु मानते हुए व्युत्पत्ति और अभ्यास को भी महत्त्व प्रदान किया है | 


2. सोमनाथ –किसी कवि की रचना को श्रवण कर पुन: पुन: अभ्यास करना काव्य का हेतु है| 

3. प्रतापसाहि – संस्कार , वृति और अभ्यास को ये काव्यहेतु मानते हैं , जो क्रमश: शक्ति ,व्युत्पत्ति , और अभ्यास के वाचक हैं | 

4. अज्ञेय – इन्होंने प्रतिभा को ही मूर्धन्य स्थान दिया है | 

5. दिनकर – इन्होंने प्रतिभा , व्युत्पत्ति और अभ्यास को ही सामूहिक रूप से काव्य - सृजन का हेतु माना है | 

काव्य हेतुओं के संदर्भ में पाश्चात्य मत -

1. प्लेटो – प्लेटो ने ‘प्रेरणा’ को काव्य हेतु माना है और यह मत प्रतिपादित किया है कि प्रेरणा के अभाव में कोई स्फुरण अम्भव नहीं है | 

There is no invention in him until he has been inspired. 

2. अरस्तू – इन्होंने प्रतिभा को महत्त्व दिया है और यह कहा है कि प्रतिभा जन्मजात होती है | 
A man of born talent. 

3. होरेस – होरेस ने प्रतिभा के साथ – साथ अभ्यास को भी महत्त्व दिया है | 
For my part I fail to see the use of study without wit or of wit without training. 

4. बेनदेतो क्रोचे – क्रोचे ने स्वयं प्रकाश ज्ञान (Intuition) और बाह्य व्यंजना (Expression) को महत्त्व देते हुए प्रतिभा और अभ्यास को काव्य हेतु के रूप में विशेष महत्त्व प्रदान किया है | 

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Sunday, 8 July 2018

Kavya Lakshan [ काव्य लक्षण ]

काव्य लक्षण (Kavya Lakshan)

समय – समय पर देश के विद्वानों ने काव्य के जो लक्षण निर्धारित किए हैं , वे निम्न हैं –

संस्कृत के आचार्य -

1. आचार्य भामह के अनुसार – 
‘शब्दार्थों सहितौ काव्यम् गद्यम पद्यं च द्विधा |”
                                            (काव्यालंकार)
अर्थात् शब्द और अर्थ का संयोग काव्य है तथा यह काव्य दो प्रकार का होता है |
1 गद्य काव्य 2 पद्य काव्य

2. आचार्य मम्मट के अनुसार – 
“तददोषौ शब्दार्थों सगुणावनलंकृती पुन: क्वापि |”
                                               (काव्यप्रकाश)

अर्थात् ऐसा शब्दार्थ जो दोष से रहित हो , माधुर्य ,ओज, प्रसाद आदि गुणों से युक्त हो तथा कभी – कभी अलंकार रहित हो तो उसे काव्य कहते हैं |

3. आचार्य विश्वनाथ के अनुसार – 
“वाक्यं रसात्मकं काव्यम्”
                (साहित्यदर्पण)
अर्थात् रस से युक्त वाक्य ही काव्य है |

4. आचार्य जगन्नाथ के अनुसार –
“रमणीयार्थप्रतिपादक: शब्द: काव्यम्”
                                    (रसगंगाधर )
अर्थात् रमणीय अर्थ का प्रतिपादक शब्द ही काव्य कहलाता है |

5. आचार्य हेमचन्द्र के अनुसार – 
“अदोषौ सगुणौ सालंकारौ च शब्दार्थों काव्यम् |”
                                            (काव्यानुशासन)
अर्थात् दोषों से रहित , गुणों व अलंकारों से युक्त शब्दार्थ काव्य कहलाता है |

6. आचार्य दण्डी के अनुसार – 
“शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली |”
                                       (काव्यादर्श)
अर्थात् काव्य का शरीर तो इष्ट अर्थ से युक्त पदावली होता है |

7 आनंदवर्द्धन के अनुसार –
“काव्यस्यात्मा ध्वनि: |” शब्दार्थ , शरीरं तावत्काव्यम् |
अर्थात् काव्य की आत्मा ‘ध्वनि’ और शब्दार्थ शरीर है |

हिंदी के कवि-

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार – 
“जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार ह्रदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है | ह्रदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आयी है , उसे कविता कहते हैं |”

2 आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अनुसार – 
“प्रभाव डालने की क्षमता और आनंद प्रदान करने की शक्ति ही काव्य है |”

3 सुमित्रानंदन पंत के अनुसार – 
“कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है |”

4 महादेवी वर्मा के अनुसार – 
“कविता कवि विशेष की भावनाओं का चित्रण है और वह चित्रण इतना ठीक है कि उससे वैसी ही भावनाएँ किसी दूसरे के ह्रदय में आविर्भूत होती हैं |”

5 जयशंकर प्रसाद के अनुसार – 
“सत्य की अपने पूर्ण सौन्दर्य के साथ अभिव्यक्ति काव्य है|”

6 प्रेमचन्द के अनुसार – 
“काव्य जीवन की आलोचना है |”

7 चिंतामणि के अनुसार –
“सगुन अलंकारन सहित , दोषरहित जो होई |
सबद अर्थ वारौ कवित्त , विबुध कहत सब कोई ||”

8 ठाकुर कवि के अनुसार – 
“पंडित और प्रवीनन को जोइ चित्त हरै सो कवित्त कहावै |”

9 बाबू गुलाबराय के अनुसार – 
“काव्य संसार के प्रति कवि की भाव प्रधान मानसिक प्रतिक्रियाओं के श्रेय को प्रेय देने वाली अभिव्यक्ति है |”

अंग्रेजी के कवि -

1 कॉलरेज – 
Poetry is the best words in their best order.
अर्थात् सर्वोत्तम शब्द अपने सर्वोत्तम क्रम में कविता होती है |

2 ड्राइडन –
Poetry is articulate music.
अर्थात् कविता सुस्पष्ट संगीत है |

3 मैथ्यू अनॉल्ड – 
Poetry is at bottom , a criticism of life .
अर्थात् कविता अपने मूल रूप में जीवन की आलोचना है |

4 वर्ड्सवर्थ – 
Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings, it takes its origin from emotions recollected in tranquility.
अर्थात् कविता प्रबल अनुभूतियों का सहज उद्रेक है ,जिसका स्रोत शांति के समय में स्मृत मनोवेगों से फूटता है |

5 शेली – 
Poetry is the record of the best and happiest moments of the happiest and best minds.
अर्थात् सर्वमुखी और सर्वोत्तम मनों के सर्वोत्तम और सर्वाधिक सुखपूर्ण क्षणों का लेखा कविता है |

6 डॉ जॉनसन –
Poetry is the art of uniting pleasure with truth by calling imagination to the help of reason.
अर्थात् कविता सत्य और आनंद के एकीकरण की कला है , जिसमें विवेक के साथ कल्पना का प्रयोग होता है |


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Sunday, 1 July 2018

Vyanjana Shabd Shakti ke bhed [व्यंजना शब्द शक्ति के भेद]

व्यंजना शब्द शक्ति


व्यंजना शब्द शक्ति – जब किसी शब्द के अभिप्रेत अर्थ का बोध न तो मुख्यार्थ से होता है और न ही लक्ष्यार्थ से , अपितु कथन के संदर्भ के अनुसार अलग – अलग अर्थ से या व्यंग्यार्थ से प्रकट होता हो वहाँ वह शब्द व्यंजक कहलाता है , उसके द्वारा प्रकट होने वाला अर्थ व्यंग्यार्थ या ध्वन्यार्थ कहलाता है तथा उस शब्द की शक्ति को व्यंजना शब्द शक्ति कहते हैं | 

जैसे – सूरज डूब गया |

इस वाक्य का वाच्यार्थ या मुख्यार्थ एक ही रहने पर भी अलग – अलग भावार्थ लगा लिए जाने के कारण यहाँ व्यंजना शब्द शक्ति मानी जाती है | 



इस शब्द शक्ति को ध्वन्यार्थ इसलिए कहा जाता है कि इसमें अर्थ ध्वनित होता है | जैसे घंटे पर चोट लगने पर जोर जोर की टंकार होती है , उसके बाद उसमें से मंद – मंद झंकार निकलती है जो देर तक गूँजती रहती है | उसी प्रकार इस शब्द शक्ति में भी शब्द से पहले मुख्यार्थ का बोध होता है उसके बाद वक्ता , श्रोता और संदर्भ भेद से अन्य अनेक अर्थ ध्वनित होते हैं | 

जैसे – पुजारी ने कहा, “अरे ! संध्या हो गई |” 

व्यंजना शब्द शक्ति के भेद -

1 शाब्दी व्यंजना – जहाँ शब्द विशेष के कारण व्यंग्यार्थ का बोध होता है और वह शब्द हटा देने पर व्यंग्यार्थ समाप्त हो जाता है , वहाँ शाब्दी व्यंजना होती है |

जैसे – 
चिरजीवौ जोरी जुरै , क्यों न सनेह गंभीर |
को घटि ए वृषभानुजा , वे हलधर के वीर ||



यहाँ वृषभानुजा , हलधर के वीर शब्दों के कारण व्यंजना सौन्दर्य है | इनके दो – दो अर्थ हैं – राधा , गाय तथा श्रीकृष्ण , बैल | यदि वृषभानुजा , हलधर के वीर शब्दों को हटाकर उनके स्थान पर अन्य पर्यायवाची शब्द रख दिया जाए तो व्यंजना समाप्त हो जाएगी | 

शाब्दी व्यंजना के भेद - 

1 अभिधामूला शाब्दी व्यंजना – जहाँ एक ही शब्द के अनेक अर्थ होते हैं , वहाँ किस अर्थ विशेष को ग्रहण किया जाए , इसका निर्णय अभिधामूला शाब्दी व्यंजना करती है | अभिधामूला शाब्दी व्यंजना में शब्द का पर्याय रख देने से व्यंजना का लोप हो जाता है तथा व्यंग्यार्थ का बोध मुख्यार्थ के माध्यम से होता है |


जैसे –
सोहत नाग न मद बिना , तान बिना नहीं राग |

यहाँ नाग और राग दोनों शब्द अनेकार्थी हैं परन्तु ‘वियोग’ कारण से इनका अर्थ नियंत्रित कर दिया गया है | इसलिए यहाँ पर ‘नाग’ का अर्थ हाथी और ‘राग’ का अर्थ रागिनी | अब यदि यहाँ नाग का पर्यायवाची भुजंग रख दिया जाए तो यह व्यंग्यार्थी हो जाएगा |

2. लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना – जहाँ किसी शब्द के लाक्षणिक अर्थ से उसके व्यंग्यार्थ पर पहुँचा जाए और शब्द का पर्याय रख देने से व्यंजना का लोप हो जाए , वहाँ लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना होती है |

जैसे -
आप तो निरे वैशाखनंदन हैं |

2 आर्थी व्यंजना – जब व्यंजना किसी शब्द विशेष पर आधारित न होकर अर्थ पर आधारित होती है , तो वहाँ आर्थी व्यंजना मानी जाती है |

जैसे - 
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी |
आँचल में है दूध और आँखों में पानी ||

यहाँ नीचे वाली पंक्ति से नारी के दो गुणों की व्यंजना होती है – उनका ममत्व भाव एवं कष्ट सहने की क्षमता | यहाँ व्यंग्यार्थ शब्द से नहीं अपितु अर्थ से है | 


शब्द शक्तियों का तुलनात्मक अध्ययन -
अभिधा
लक्षणा
व्यंजना
अभिधा में केवल मुख्य अर्थ या लोक प्रसिद्ध अर्थ प्रकट होता है |
लक्षणा में शब्द के मुख्यार्थ से हटकर उसी के लक्षण के आधार पर अन्य अर्थ निकाला जाता है | 

मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ से भिन्न कोई अन्य अर्थ प्रकट होता है |
इसका अर्थ निश्चित होता है कोई कल्पना का प्रयोग नहीं होता है | 

अर्थ निश्चित नहीं होता है , परन्तु अर्थ की दिशा निश्चित होती है अर्थात् लक्षण के आधार पर अर्थ निकाला जाता है | प्रसंग के आधार पर अर्थ का स्वरूप तय होता है | कल्पना का सहारा लेना पड़ता है |
इसके लिए किसी अन्य शक्ति की आवश्यकता नहीं पड़ती | लक्ष्यार्थ निकालने में अभिधा शक्ति की आवश्यकता पड़ती है | अभिधा व लक्षणा दोनों की आवश्यकता पड़ती है |
इसमें पाठक या श्रोता वास्तविक अर्थ ग्रहण करता है | मुख्यार्थ से परे लक्षणानुसार अपनी कल्पना और तर्क से अभीष्ट अर्थ तक पहुँचता है |इसमें संकेत भर होता है | बाकी समस्त अर्थ पाठक या श्रोता प्रसंग के आधार पर ग्रहण करता है |


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Shabd Shakti in Hindi (Examples) [शब्द – शक्ति : शुद्धा, गौणी , सारोपा, रुढ़ा, उपादान, लक्षण, साध्यवसान, प्रयोजनवती लक्षणा ]



शब्द के अर्थ का बोध कराने वाली शक्ति को ‘शब्दशक्ति’ कहते हैं | शब्दशक्ति शब्द के अर्थ का बोध कराने का व्यापार है | 

शब्द के तीन प्रकार होते हैं – 
वाचक शब्द , लक्षक शब्द , व्यंजक शब्द

अर्थ तीन प्रकार के होते हैं – 

वाच्यार्थ , लक्ष्यार्थ , व्यंग्यार्थ

शब्द और अर्थ के अनुसार शब्दशक्तियाँ भी तीन होती हैं – 
अभिधा ,  लक्षणा और व्यंजना |



1 अभिधा शब्द शक्ति

“अनेकार्थक हूँ सबद में , एक अर्थ की भक्ति |
तिहि वाच्यारथ को कहे , सज्जन अभिधा शक्ति ||”

 
साक्षात् सांकेतित अर्थ (मुख्यार्थ या वाच्यार्थ) को प्रकट करने वाली शब्दशक्ति अभिधा शब्दशक्ति कहलाती है | इसे ‘प्रथमा’ एवं ‘अग्रिमा’ शक्ति भी कहते हैं | मुख्यार्थ की बोधिका होने के अतिरिक्त यह शक्ति पद और पदार्थ के पारस्परिक संबंध का भी ज्ञान कराती है | जैसे – 
गाय दूध देती है | मोहन पढ़ता है | 


आचार्य मम्मट के अनुसार – 

स मुख्योऽर्थस्तत्र मुख्यो व्यापारोऽस्याभिधोच्यते |

अभिधा शब्द शक्ति से जिन शब्दों का अर्थ बोध होता है ; वे तीन प्रकार के होते हैं – 

1 रूढ़            2 यौगिक        3 योगरूढ़

1. रूढ़ शब्द – जिन शब्दों के खंड न हो , सम्पूर्ण शब्दों का एक ही अर्थ प्रकट हो , उन्हें रूढ़ शब्द कहते हैं | जैसे –


पेड़ , हाथी , मेज , कलम आदि |

2. यौगिक शब्द – प्रत्यय ,कृदन्त , समास इत्यादि के संयोग से बने वे शब्द , जो समुदाय के अर्थ का बोध कराते हैं , उन्हें यौगिक शब्द कहते हैं | जैसे – 

महेश , दिवाकर , पाठशाला आदि | 

3. योगरूढ़ शब्द – जो शब्द यौगिक की प्रक्रिया से बने हों किन्तु उनका एक निश्चित अर्थ रूढ़ हो गया हो , उन्हें योगरूढ़ शब्द कहते हैं | जैसे – 

जलज , गणनायक इत्यादि |

ध्यान रखने योग्य बातें

1 जब किसी पद में ‘यमक’ अलंकार की प्राप्ति होती है तो वहाँ प्राय: अभिधा शब्द शक्ति होती है |

2 कभी – कभी ‘उत्प्रेक्षा’ अलंकार के पदों में भी उनका मुख्य अर्थ ही प्रकट होता है , अत: इस अलंकार के पदों में भी प्राय: ( सदैव नहीं ) अभिधा शब्द शक्ति होती है |



2. लक्षणा शब्द शक्ति – जहाँ मुख्य अर्थ में बाधा उपस्थित होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन के आधार पर मुख्य अर्थ से संबंधित अन्य अर्थ को लक्ष्य किया जाता है , वहाँ लक्षणा शब्द शक्ति होती है | जैसे –

मोहन गधा है |
यहाँ गधे का लक्ष्यार्थ है मूर्ख |

आचार्य मम्मट के अनुसार – 
“मुख्यार्थ बाधे तद्योगे रूढ़ितोऽथ प्रयोजनात् |
अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणारोपिता क्रिया ||”

1 जहाँ मुख्यार्थ की बाधा हो 
2 मुख्यार्थ से संबंधित लक्ष्यार्थ हो और 
3 जहाँ रूढ़ि अथवा प्रयोजन हो , तो लक्षणा शब्द शक्ति होती है |  जैसे – 

सिंह अखाड़े में उतर रहा है |
यहाँ ‘सिंह’ वीर पुरुष के लिए रूढ़ हो गया है |

लक्षणा शब्द शक्ति के भेद -


लक्षणा शब्द शक्ति के भेद

1. रूढ़ा लक्षणा – जहाँ मुख्यार्थ में बाधा होने पर रूढ़ि के आधार पर लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है , वहाँ रूढ़ा लक्षणा होती है | जैसे – 

पंजाब वीर है |

इस वाक्य में पंजाब का लक्ष्यार्थ है – पंजाब के निवासी | यह अर्थ रूढ़ि के आधार पर ग्रहण किया गया है , अत: यहाँ रूढ़ा लक्षणा है | 

अन्य उदाहरण – 
1 मुँह पर ताला लगा लो |
2 महाराष्ट्र साहसी है |
3 भाग जग्यो उमगो उर आली , उदै भयो है अनुराग हमारो |

2. प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ किसी विशेष प्रयोजन के कारण मुख्यार्थ को बाधित करके उससे संबंधित लक्ष्यार्थ का बोध होता है , वहाँ प्रयोजनवती लक्षणा होती है | जैसे – 

आँख उठाकर देखा तो सा 1 भाले प्रवेश कर रहे हैं | (युद्ध भूमि में ‘भालेधारी सैनिक प्रवेश कर रहे है)
2 वह स्त्री तो गंगा है | मने हड्डियों का ढाँचा खड़ा था |
यहाँ हड्डियों के ढाँचे द्वारा व्यक्ति को दुर्बल बताना वक्ता का प्रयोजन है |

अन्य उदाहरण – 
1 भाले प्रवेश कर रहे हैं | (युद्ध भूमि में ‘भालेधारी सैनिक प्रवेश कर रहे है)
2 वह स्त्री तो गंगा है |

प्रयोजनवती लक्षणा -


1. गौणी लक्षणा – जहाँ गुण सादृश्य के आधार पर लक्ष्यार्थ का बोध होता है , वहाँ गौणी लक्षणा होती है | जैसे – 

मुख चन्द्र है | 
यहाँ मुख्यार्थ है मुख चंद्रमा है परन्तु मुख्यार्थ में यह बाधा है कि ‘मुख चंद्रमा कैसे हो सकता है |’ तब लक्ष्यार्थ यह लिया जाता है कि ‘मुख चन्द्रमा जैसा सुंदर है |’ यह अर्थ सादृश्य संबंध के कारण लिया जाता है | अत: यहाँ गौणी लक्षणा है | अन्य उदाहरण – 
नीतेश शेर है | 

2. शुद्धा लक्षणा – जहाँ गुण सादृश्य को छोड़कर अन्य किसी आधार यथा – समीपता , साहचर्य , आधार – आधेय संबंध के आधार पर लक्ष्यार्थ ग्रहण किया गया हो , वहाँ शुद्धा लक्षणा होती है | जैसे – 

मेरे सिर पर क्यों बैठते हो | (सामीप्य संबंध )
लाल पगड़ी आ रही है | (सिपाही – सादृश्य संबंध ) 

गौणी लक्षणा  -



1. सारोपा लक्षणा – जब किसी पद में उपमेय और उपमान दोनों का शब्द द्वारा निर्देश करते हुए अभेद बतलाया जाता है , वहाँ सारोपा लक्षणा होती है | जैसे – 

उदित उदयगिरि मंच पर रघुवर बाल पतंग | यहाँ उदयगिरि रूपी मंच पर राम रूपी प्रभातकालीन सूर्य का उदय दिखाकर उपमेय का उपमान पर अभेद आरोप किया गया है अत: यहाँ सारोपा लक्षणा है | 

अन्य उदाहरण –

आज भुजंगों से बैठे हैं , वे कंचन के घड़े दबाये |

विनय हार कर कहती है , ये विषधर (पूँजीपति ) हटते नहीं हटाये ||


2. साध्यवसाना लक्षणा – इसमें केवल उपमान का कथन होता है , लक्ष्यार्थ की प्रतीति हेतु उपमेय पूरी तरह छिप जाता है , तो वहाँ साध्यवसाना लक्षणा होती है | जैसे – 

जब शेर आया तो युद्ध क्षेत्र से गीदड़ भाग गए |

यहाँ शेर का तात्पर्य वीर पुरुष से है तथा गीदड़ का तात्पर्य कायरों से है | उपमेय को पूरी तरह छिपा देने के कारण यहाँ साध्यवसाना लक्षणा है |



शुद्धा लक्षणा 


1. उपादान लक्षणा – जहाँ मुख्यार्थ बना रहता है तथा लक्ष्यार्थ का बोध मुख्यार्थ के साथ ही होता है वहाँ उपादान लक्षणा होती है | जैसे – 

सारा घर तमाशा देखने गया है | 

इस वाक्य में ‘घर’ का अर्थ ‘आधार – आधेय’ भाव से ‘घर के लोग’ ग्रहण किया जाता है ,अत: यहाँ शुद्धा लक्षणा है तथा लाक्षणिक अर्थ ग्रहण करने पर भी ‘घर’ का अपना मूल अर्थ छूटा नहीं है अतएव यहाँ उपादान लक्षणा है | 


2. लक्षण लक्षणा – जब किसी शब्द का लाक्षणिक अर्थ ग्रहण करते समय उसका मुख्य अर्थ पूर्णत: लुप्त हो जाता है तो वहाँ लक्षण लक्षणा शब्द शक्ति होती है | जैसे – 

गंगा पर गाँव है |
इसमें गंगा शब्द का अर्थ अर्थात् मुख्यार्थ ( प्रवाह ) सर्वथा छोड़ देता है |


लक्षणा शब्द शक्ति के भेद


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