Tuesday 17 July 2018

Kavya Prayojan [ काव्य – प्रयोजन ]

Kavya Prayojan [ काव्य – प्रयोजन ]
Kavya Prayojan [ काव्य – प्रयोजन ]

प्रयोजन का अर्थ है उद्देश्य – कोई भी कार्य बिना प्रयोजन के नहीं किया जाता | माना जाता है कि - 
 “प्रयोजनं विना तु मन्दोऽपि न प्रवर्तते |” 

काव्य प्रयोजन के विषय में संस्कृत आचार्यों का मत 

1. आचार्य भरतमुनि के अनुसार – भरतमुनि ने अपने ग्रन्थ नाट्यशास्त्र में लिखा है – 
“धर्मं यशस्यं आयुष्यं हितं बुद्धिविवर्धनम् | लोकोपदेशजननं नाट्यमेतद् भविष्यति ||” 

अर्थात् एक नाटक (नाट्य काव्य ) लेखन के निम्न छह प्रयोजन माने जा सकते हैं – 
1 धर्म
2 यश
3 आयु
4 हित
5 बुद्धि का विकास
6 लौकिक ज्ञान

अन्य स्थान पर वे लिखते हैं – 
दु:खार्तानां श्रमार्तानां शोकार्तानां तपस्वीनाम् | विश्रान्तिजननं काले नाट्यमेतद् भविष्यति ||” 

अर्थात् दु:खार्त , श्रमार्त एवं शोकार्त व्यक्ति को सुख और शांति की प्राप्ति ही काव्य लेखन का प्रयोजन है | 

2. आचार्य भामह के अनुसार – भामह की रचना काव्यालंकार के अनुसार काव्य प्रयोजन है – 
“धर्मार्थकाममोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च | करोति कीर्तिं प्रीतिञ्च साधुकाव्य निबन्धनम् ||” 

अर्थात् आचार्य भामह ने काव्य के निम्न प्रयोजन स्वीकार किए हैं – 
1 पुरुषार्थ चतुष्टय ( धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष ) की प्राप्ति
2 कलाओं में निपुणता
3 कीर्ति (यश ) और प्रीति (आनंद ) की प्राप्ति |
3. आचार्य मम्मट के अनुसार – आचार्य मम्मट ने अपनी रचना ‘काव्यप्रकाश’ में काव्य प्रयोजनों को इस प्रकार व्यक्त किया है – 
“काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये | सद्यः परिनिर्वृत्त्ये कान्तासम्मितयोपदेशयुजे || 

मम्मट के अनुसार काव्य के छह प्रयोजन हैं , जो इस प्रकार हैं – 
1 यश प्राप्ति
2 अर्थ प्राप्ति
3 लोक व्यवहार का ज्ञान
4 अनिष्ट का निवारण
5 आत्मशांति
6 कान्तासम्मित उपदेश
1. यश प्राप्ति – काव्य लेखन से कवि को यश प्राप्त होता है और वह सदा के लिए अमर हो जाता है | 

2. अर्थ प्राप्ति – काव्य लेखन से कवि को अर्थ अर्थात् धन की प्राप्ति होती है | 

3. लोक व्यवहार का ज्ञान – इसका संबंध पाठकों से है अर्थात् एक श्रेष्ठ काव्य के पठन से पाठकों को मानवोचित शिक्षा प्राप्त होती है | 

4. अनिष्ट का निवारण – यहाँ ‘शिवेतर’ का अर्थ है – अमंगल और ‘क्षतये’ का अर्थ है – विनाश अर्थात् काव्य लेखन से कवि के एवं काव्य के पठन से पाठक के अनिष्ट का निवारण होता है | 

5. आत्म शांति – इसका संबंध मुख्यत: पाठक से है अर्थात् काव्य पठन से पाठक को पढ़ने के साथ ही आनंद का अनुभव होता है और उसे परम शांति की प्राप्ति होती है | 

6. कान्तासम्मित उपदेश – उपदेश तीन प्रकार के माने जाते हैं – 
(क) प्रभु सम्मित उपदेश – ऐसा उपदेश जो हमारे लिए हितकर तो होता है ,परन्तु रुचिकर नहीं होता , वह प्रभु सम्मित उपदेश कहलाता है |
(ख) मित्र सम्मित उपदेश – यह उपदेश हितकर भी होता है और रुचिकर भी ,परन्तु इसकी अवहेलना भी की जा सकती है |
(ग) कान्तासम्मित उपदेश - यह उपदेश हितकर भी होता है और रुचिकर भी होता है तथा इसकी कभी अवहेलना भी नहीं की जा सकती है | काव्य का उपदेश इसी श्रेणी का उपदेश माना जाता है |

4 आचार्य विश्वनाथ के अनुसार – विश्वनाथ ने अपने ग्रन्थ ‘साहित्यदर्पण’ में काव्य प्रयोजनों का विवेचन इस प्रकार किया गया है – 
“चतुर्वर्गफलप्राप्ति: सुखादल्पधियामपि | काव्यादेव यतस्तेन तत्स्वरूपं निरुप्यते ||” 

हिंदी कवियों का मत 

1. तुलसीदास – तुलसीदास ने ‘स्वान्त: सुखाय’ को साहित्य का उद्देश्य मानते हुए लिखा है – 
‘स्वान्त: सुखाय तुलसी रघुनाथा गाथा भाषा निबंध मतिमंजुल मातनोति |’ 

2. भिखारीदास – यश को काव्य का मुख्य प्रयोजन मानते हैं – 
एकन्ह को जसही सों प्रयोजन है रसखानि रहीम की नाई | 
दास कवित्तन्ह की चरचा बुधिवन्तन को सुख दै सब ठाई || 

इन्होंने काव्य के 5 प्रयोजन बताये हैं तप: पुंज का फल , संपत्ति लोभ , यशप्राप्ति , सहृदयों को आनंदोपलाब्धि तथा सुखपूर्वक शिक्षा की प्राप्ति | 

3. कुलपति मिश्र – आचार्य कुलपति मिश्र ने यश ,धन , आनंद और व्यवहार ज्ञान को काव्य का प्रयोजन बताया है | 

4. सोमनाथ – आचार्य सोमनाथ ने कीर्ति , धन , मनोरंजन , अनिष्टनाश और उपदेश को काव्य का प्रयोजन स्वीकार किया है | 

5 मैथिलीशरण गुप्त – राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने मनोरंजन और उपदेश को काव्य का प्रयोजन माना – 
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए | उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए || 

6. डॉ नगेन्द्र – नगेन्द्र की दृष्टि में काव्य के मूलत: 2 प्रयोजन हैं – आनंद और लोकमंगल , जिनमें सापेक्षिक मूल्य आनंद का ही अधिक है | 

7. डॉ गुलाबराय – गुलाबराय के मत में रसानंद ही जीवन का रस है | 

8. प्रेमचंद – साहित्य का उद्देश्य हमारी अनुभूति की तीव्रता को बढ़ाना है | 

पाश्चात्य चिंतकों के मत 

1. सुकरात – इनके अनुसार दैवी प्रेरणा काव्य की मूल प्रेरणा है | 

2. प्लेटो – प्लेटो लोकमंगल को काव्य का चरम लक्ष्य मानते हैं | 

3. अरस्तू – इनके अनुसार कला का विशिष्ट उद्देश्य आनंद है | यह अनैतिक नहीं हो सकता | 

4. होरेस – होरेस आनंद और लोककल्याण को ही काव्य का प्रयोजन स्वीकार करते हैं | 

5. मैथ्यू आर्नल्ड – इनकी दृष्टि में जीवन की व्याख्या करना ही काव्य का प्रयोजन है | 

6. ड्राइडन – इनके अनुसार स्वान्तः सुखाय और परजन हिताय काव्य के प्रयोजन हैं |

YouTube - (Coming on 18th July)



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3 comments:

  1. काव्यांश से भी क्वेश्चन बनाये please

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  2. जी बहुत ही अच्छी पाठ्यसामग्री

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