Sunday, 1 July 2018

Shabd Shakti in Hindi (Examples) [शब्द – शक्ति : शुद्धा, गौणी , सारोपा, रुढ़ा, उपादान, लक्षण, साध्यवसान, प्रयोजनवती लक्षणा ]



शब्द के अर्थ का बोध कराने वाली शक्ति को ‘शब्दशक्ति’ कहते हैं | शब्दशक्ति शब्द के अर्थ का बोध कराने का व्यापार है | 

शब्द के तीन प्रकार होते हैं – 
वाचक शब्द , लक्षक शब्द , व्यंजक शब्द

अर्थ तीन प्रकार के होते हैं – 

वाच्यार्थ , लक्ष्यार्थ , व्यंग्यार्थ

शब्द और अर्थ के अनुसार शब्दशक्तियाँ भी तीन होती हैं – 
अभिधा ,  लक्षणा और व्यंजना |



1 अभिधा शब्द शक्ति

“अनेकार्थक हूँ सबद में , एक अर्थ की भक्ति |
तिहि वाच्यारथ को कहे , सज्जन अभिधा शक्ति ||”

 
साक्षात् सांकेतित अर्थ (मुख्यार्थ या वाच्यार्थ) को प्रकट करने वाली शब्दशक्ति अभिधा शब्दशक्ति कहलाती है | इसे ‘प्रथमा’ एवं ‘अग्रिमा’ शक्ति भी कहते हैं | मुख्यार्थ की बोधिका होने के अतिरिक्त यह शक्ति पद और पदार्थ के पारस्परिक संबंध का भी ज्ञान कराती है | जैसे – 
गाय दूध देती है | मोहन पढ़ता है | 


आचार्य मम्मट के अनुसार – 

स मुख्योऽर्थस्तत्र मुख्यो व्यापारोऽस्याभिधोच्यते |

अभिधा शब्द शक्ति से जिन शब्दों का अर्थ बोध होता है ; वे तीन प्रकार के होते हैं – 

1 रूढ़            2 यौगिक        3 योगरूढ़

1. रूढ़ शब्द – जिन शब्दों के खंड न हो , सम्पूर्ण शब्दों का एक ही अर्थ प्रकट हो , उन्हें रूढ़ शब्द कहते हैं | जैसे –


पेड़ , हाथी , मेज , कलम आदि |

2. यौगिक शब्द – प्रत्यय ,कृदन्त , समास इत्यादि के संयोग से बने वे शब्द , जो समुदाय के अर्थ का बोध कराते हैं , उन्हें यौगिक शब्द कहते हैं | जैसे – 

महेश , दिवाकर , पाठशाला आदि | 

3. योगरूढ़ शब्द – जो शब्द यौगिक की प्रक्रिया से बने हों किन्तु उनका एक निश्चित अर्थ रूढ़ हो गया हो , उन्हें योगरूढ़ शब्द कहते हैं | जैसे – 

जलज , गणनायक इत्यादि |

ध्यान रखने योग्य बातें

1 जब किसी पद में ‘यमक’ अलंकार की प्राप्ति होती है तो वहाँ प्राय: अभिधा शब्द शक्ति होती है |

2 कभी – कभी ‘उत्प्रेक्षा’ अलंकार के पदों में भी उनका मुख्य अर्थ ही प्रकट होता है , अत: इस अलंकार के पदों में भी प्राय: ( सदैव नहीं ) अभिधा शब्द शक्ति होती है |



2. लक्षणा शब्द शक्ति – जहाँ मुख्य अर्थ में बाधा उपस्थित होने पर रूढ़ि अथवा प्रयोजन के आधार पर मुख्य अर्थ से संबंधित अन्य अर्थ को लक्ष्य किया जाता है , वहाँ लक्षणा शब्द शक्ति होती है | जैसे –

मोहन गधा है |
यहाँ गधे का लक्ष्यार्थ है मूर्ख |

आचार्य मम्मट के अनुसार – 
“मुख्यार्थ बाधे तद्योगे रूढ़ितोऽथ प्रयोजनात् |
अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणारोपिता क्रिया ||”

1 जहाँ मुख्यार्थ की बाधा हो 
2 मुख्यार्थ से संबंधित लक्ष्यार्थ हो और 
3 जहाँ रूढ़ि अथवा प्रयोजन हो , तो लक्षणा शब्द शक्ति होती है |  जैसे – 

सिंह अखाड़े में उतर रहा है |
यहाँ ‘सिंह’ वीर पुरुष के लिए रूढ़ हो गया है |

लक्षणा शब्द शक्ति के भेद -


लक्षणा शब्द शक्ति के भेद

1. रूढ़ा लक्षणा – जहाँ मुख्यार्थ में बाधा होने पर रूढ़ि के आधार पर लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है , वहाँ रूढ़ा लक्षणा होती है | जैसे – 

पंजाब वीर है |

इस वाक्य में पंजाब का लक्ष्यार्थ है – पंजाब के निवासी | यह अर्थ रूढ़ि के आधार पर ग्रहण किया गया है , अत: यहाँ रूढ़ा लक्षणा है | 

अन्य उदाहरण – 
1 मुँह पर ताला लगा लो |
2 महाराष्ट्र साहसी है |
3 भाग जग्यो उमगो उर आली , उदै भयो है अनुराग हमारो |

2. प्रयोजनवती लक्षणा – जहाँ किसी विशेष प्रयोजन के कारण मुख्यार्थ को बाधित करके उससे संबंधित लक्ष्यार्थ का बोध होता है , वहाँ प्रयोजनवती लक्षणा होती है | जैसे – 

आँख उठाकर देखा तो सा 1 भाले प्रवेश कर रहे हैं | (युद्ध भूमि में ‘भालेधारी सैनिक प्रवेश कर रहे है)
2 वह स्त्री तो गंगा है | मने हड्डियों का ढाँचा खड़ा था |
यहाँ हड्डियों के ढाँचे द्वारा व्यक्ति को दुर्बल बताना वक्ता का प्रयोजन है |

अन्य उदाहरण – 
1 भाले प्रवेश कर रहे हैं | (युद्ध भूमि में ‘भालेधारी सैनिक प्रवेश कर रहे है)
2 वह स्त्री तो गंगा है |

प्रयोजनवती लक्षणा -


1. गौणी लक्षणा – जहाँ गुण सादृश्य के आधार पर लक्ष्यार्थ का बोध होता है , वहाँ गौणी लक्षणा होती है | जैसे – 

मुख चन्द्र है | 
यहाँ मुख्यार्थ है मुख चंद्रमा है परन्तु मुख्यार्थ में यह बाधा है कि ‘मुख चंद्रमा कैसे हो सकता है |’ तब लक्ष्यार्थ यह लिया जाता है कि ‘मुख चन्द्रमा जैसा सुंदर है |’ यह अर्थ सादृश्य संबंध के कारण लिया जाता है | अत: यहाँ गौणी लक्षणा है | अन्य उदाहरण – 
नीतेश शेर है | 

2. शुद्धा लक्षणा – जहाँ गुण सादृश्य को छोड़कर अन्य किसी आधार यथा – समीपता , साहचर्य , आधार – आधेय संबंध के आधार पर लक्ष्यार्थ ग्रहण किया गया हो , वहाँ शुद्धा लक्षणा होती है | जैसे – 

मेरे सिर पर क्यों बैठते हो | (सामीप्य संबंध )
लाल पगड़ी आ रही है | (सिपाही – सादृश्य संबंध ) 

गौणी लक्षणा  -



1. सारोपा लक्षणा – जब किसी पद में उपमेय और उपमान दोनों का शब्द द्वारा निर्देश करते हुए अभेद बतलाया जाता है , वहाँ सारोपा लक्षणा होती है | जैसे – 

उदित उदयगिरि मंच पर रघुवर बाल पतंग | यहाँ उदयगिरि रूपी मंच पर राम रूपी प्रभातकालीन सूर्य का उदय दिखाकर उपमेय का उपमान पर अभेद आरोप किया गया है अत: यहाँ सारोपा लक्षणा है | 

अन्य उदाहरण –

आज भुजंगों से बैठे हैं , वे कंचन के घड़े दबाये |

विनय हार कर कहती है , ये विषधर (पूँजीपति ) हटते नहीं हटाये ||


2. साध्यवसाना लक्षणा – इसमें केवल उपमान का कथन होता है , लक्ष्यार्थ की प्रतीति हेतु उपमेय पूरी तरह छिप जाता है , तो वहाँ साध्यवसाना लक्षणा होती है | जैसे – 

जब शेर आया तो युद्ध क्षेत्र से गीदड़ भाग गए |

यहाँ शेर का तात्पर्य वीर पुरुष से है तथा गीदड़ का तात्पर्य कायरों से है | उपमेय को पूरी तरह छिपा देने के कारण यहाँ साध्यवसाना लक्षणा है |



शुद्धा लक्षणा 


1. उपादान लक्षणा – जहाँ मुख्यार्थ बना रहता है तथा लक्ष्यार्थ का बोध मुख्यार्थ के साथ ही होता है वहाँ उपादान लक्षणा होती है | जैसे – 

सारा घर तमाशा देखने गया है | 

इस वाक्य में ‘घर’ का अर्थ ‘आधार – आधेय’ भाव से ‘घर के लोग’ ग्रहण किया जाता है ,अत: यहाँ शुद्धा लक्षणा है तथा लाक्षणिक अर्थ ग्रहण करने पर भी ‘घर’ का अपना मूल अर्थ छूटा नहीं है अतएव यहाँ उपादान लक्षणा है | 


2. लक्षण लक्षणा – जब किसी शब्द का लाक्षणिक अर्थ ग्रहण करते समय उसका मुख्य अर्थ पूर्णत: लुप्त हो जाता है तो वहाँ लक्षण लक्षणा शब्द शक्ति होती है | जैसे – 

गंगा पर गाँव है |
इसमें गंगा शब्द का अर्थ अर्थात् मुख्यार्थ ( प्रवाह ) सर्वथा छोड़ देता है |


लक्षणा शब्द शक्ति के भेद


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