Sunday, 1 July 2018

Vyanjana Shabd Shakti ke bhed [व्यंजना शब्द शक्ति के भेद]

व्यंजना शब्द शक्ति


व्यंजना शब्द शक्ति – जब किसी शब्द के अभिप्रेत अर्थ का बोध न तो मुख्यार्थ से होता है और न ही लक्ष्यार्थ से , अपितु कथन के संदर्भ के अनुसार अलग – अलग अर्थ से या व्यंग्यार्थ से प्रकट होता हो वहाँ वह शब्द व्यंजक कहलाता है , उसके द्वारा प्रकट होने वाला अर्थ व्यंग्यार्थ या ध्वन्यार्थ कहलाता है तथा उस शब्द की शक्ति को व्यंजना शब्द शक्ति कहते हैं | 

जैसे – सूरज डूब गया |

इस वाक्य का वाच्यार्थ या मुख्यार्थ एक ही रहने पर भी अलग – अलग भावार्थ लगा लिए जाने के कारण यहाँ व्यंजना शब्द शक्ति मानी जाती है | 



इस शब्द शक्ति को ध्वन्यार्थ इसलिए कहा जाता है कि इसमें अर्थ ध्वनित होता है | जैसे घंटे पर चोट लगने पर जोर जोर की टंकार होती है , उसके बाद उसमें से मंद – मंद झंकार निकलती है जो देर तक गूँजती रहती है | उसी प्रकार इस शब्द शक्ति में भी शब्द से पहले मुख्यार्थ का बोध होता है उसके बाद वक्ता , श्रोता और संदर्भ भेद से अन्य अनेक अर्थ ध्वनित होते हैं | 

जैसे – पुजारी ने कहा, “अरे ! संध्या हो गई |” 

व्यंजना शब्द शक्ति के भेद -

1 शाब्दी व्यंजना – जहाँ शब्द विशेष के कारण व्यंग्यार्थ का बोध होता है और वह शब्द हटा देने पर व्यंग्यार्थ समाप्त हो जाता है , वहाँ शाब्दी व्यंजना होती है |

जैसे – 
चिरजीवौ जोरी जुरै , क्यों न सनेह गंभीर |
को घटि ए वृषभानुजा , वे हलधर के वीर ||



यहाँ वृषभानुजा , हलधर के वीर शब्दों के कारण व्यंजना सौन्दर्य है | इनके दो – दो अर्थ हैं – राधा , गाय तथा श्रीकृष्ण , बैल | यदि वृषभानुजा , हलधर के वीर शब्दों को हटाकर उनके स्थान पर अन्य पर्यायवाची शब्द रख दिया जाए तो व्यंजना समाप्त हो जाएगी | 

शाब्दी व्यंजना के भेद - 

1 अभिधामूला शाब्दी व्यंजना – जहाँ एक ही शब्द के अनेक अर्थ होते हैं , वहाँ किस अर्थ विशेष को ग्रहण किया जाए , इसका निर्णय अभिधामूला शाब्दी व्यंजना करती है | अभिधामूला शाब्दी व्यंजना में शब्द का पर्याय रख देने से व्यंजना का लोप हो जाता है तथा व्यंग्यार्थ का बोध मुख्यार्थ के माध्यम से होता है |


जैसे –
सोहत नाग न मद बिना , तान बिना नहीं राग |

यहाँ नाग और राग दोनों शब्द अनेकार्थी हैं परन्तु ‘वियोग’ कारण से इनका अर्थ नियंत्रित कर दिया गया है | इसलिए यहाँ पर ‘नाग’ का अर्थ हाथी और ‘राग’ का अर्थ रागिनी | अब यदि यहाँ नाग का पर्यायवाची भुजंग रख दिया जाए तो यह व्यंग्यार्थी हो जाएगा |

2. लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना – जहाँ किसी शब्द के लाक्षणिक अर्थ से उसके व्यंग्यार्थ पर पहुँचा जाए और शब्द का पर्याय रख देने से व्यंजना का लोप हो जाए , वहाँ लक्षणामूला शाब्दी व्यंजना होती है |

जैसे -
आप तो निरे वैशाखनंदन हैं |

2 आर्थी व्यंजना – जब व्यंजना किसी शब्द विशेष पर आधारित न होकर अर्थ पर आधारित होती है , तो वहाँ आर्थी व्यंजना मानी जाती है |

जैसे - 
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी |
आँचल में है दूध और आँखों में पानी ||

यहाँ नीचे वाली पंक्ति से नारी के दो गुणों की व्यंजना होती है – उनका ममत्व भाव एवं कष्ट सहने की क्षमता | यहाँ व्यंग्यार्थ शब्द से नहीं अपितु अर्थ से है | 


शब्द शक्तियों का तुलनात्मक अध्ययन -
अभिधा
लक्षणा
व्यंजना
अभिधा में केवल मुख्य अर्थ या लोक प्रसिद्ध अर्थ प्रकट होता है |
लक्षणा में शब्द के मुख्यार्थ से हटकर उसी के लक्षण के आधार पर अन्य अर्थ निकाला जाता है | 

मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ से भिन्न कोई अन्य अर्थ प्रकट होता है |
इसका अर्थ निश्चित होता है कोई कल्पना का प्रयोग नहीं होता है | 

अर्थ निश्चित नहीं होता है , परन्तु अर्थ की दिशा निश्चित होती है अर्थात् लक्षण के आधार पर अर्थ निकाला जाता है | प्रसंग के आधार पर अर्थ का स्वरूप तय होता है | कल्पना का सहारा लेना पड़ता है |
इसके लिए किसी अन्य शक्ति की आवश्यकता नहीं पड़ती | लक्ष्यार्थ निकालने में अभिधा शक्ति की आवश्यकता पड़ती है | अभिधा व लक्षणा दोनों की आवश्यकता पड़ती है |
इसमें पाठक या श्रोता वास्तविक अर्थ ग्रहण करता है | मुख्यार्थ से परे लक्षणानुसार अपनी कल्पना और तर्क से अभीष्ट अर्थ तक पहुँचता है |इसमें संकेत भर होता है | बाकी समस्त अर्थ पाठक या श्रोता प्रसंग के आधार पर ग्रहण करता है |


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1 comment:

  1. जी बहुत ही अच्छी पाठ्यसामग्री

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