Friday 24 May 2024


साहित्यालोचना


आधुनिक गद्य साहित्य के साथ ही हिंदी आलोचना का उदय भी भारतेंदु युग में हुआ | विश्वनाथ त्रिपाठी ने संकेत किया है कि ‘हिंदी आलोचना’ पाश्चात्य की नक़ल पर नहीं, बल्कि अपने साहित्य को समझने – बूझने और उसकी उपादेयता पर विचार करने की आवश्यकता के कारण जन्मी और विकसित हुई |

आलोचना शब्द ‘लोच’ धातु से बना है | ‘लोच’ का अर्थ है – देखना | इसलिए किसी वस्तु या कृति की सम्यक व्याख्या, उसका मूल्यांकन आदि करना ही आलोचना है |

आलोचना का उद्देश्य

  • इस बात का पता चलना कि लेखक अपनी रचना के माध्यम से क्या कहना चाहता है |
  • लेखक अपने कथन व भावों को प्रेषित करने में सफल हो सका अथवा नहीं ? यदि सफल हुआ तो किस सीमा तक हुआ ?

आलोचना का कार्य

आलोचना का मूल उद्देश्य कवि की कृति का सभी दृष्टिकोणों से आस्वाद कर, पाठकों को उस प्रकार के आस्वाद में सहायता देना तथा उनकी रुचि को परिमार्जित करना एवं साहित्य की गति निर्धारित करने में योग देना है |

इस तरह आलोचना –

  • साहित्य की व्याख्या करती है |
  • साहित्य के गुण- दोष बताती है अर्थात किसी रचना की विश्लेषण परक व्याख्या करती है |
  • साहित्य के निर्माण की दिशा निर्धारित करती है |
  • उन तत्वों का विश्लेषण करती है जिन तत्वों को लेकर साहित्य की रचना होती है |
  • आलोचना में बुद्धि तत्व प्रधान होता है जबकि साहित्य में राग तत्व |
  • आलोचना द्वारा ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनैतिक परिस्थितियों का आकलन किया जाना |
  • व्यक्तिगत रुचि के आधार पर किसी रचना की प्रशंसा या निंदा न करना |

आलोचक के गुण

  1. निष्पक्षता
  2. साहस
  3. सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण
  4. इतिहास और वर्तमान का सम्यक ज्ञान
  5. देशी – विदेशी साहित्य और कलाओं का ज्ञान
  6. संवेदनशीलता
  7. अध्ययनशीलता एवं मननशीलता
इन गुणों के अभाव में आलोचक रचना के ऊपरी गुण तो देख लेता है किंतु उसके पास उस रचना को अन्दर तक देखने उसके मर्म को समझने की क्षमता नहीं होती |

आचार्य रामचंद्र शुक्ल को सर्वश्रेष्ठ आलोचक माना जाता है |

आलोचना के प्रकार

1. सैद्धांतिक आलोचना

  • शास्त्रीय मानदंडों को निश्चित करना |
  • एक ही प्रकार की विभिन्न कृतियों का अध्ययन कर शास्त्रीय मानदंडों के रूप में सामान्य नियमों की स्थापना किया जाना |
  • कविता क्या है ? उसका उद्देश्य क्या है ? समाज की दृष्टि से उसके लाभ हैं ? इस प्रकार की बातों पर विचार किया जाना |

2. मनोविज्ञानिक आलोचना

  • रचनागत पात्रों की, प्रवृत्तियों की, आदर्शों की, भावधाराओं की तथा अंत: प्रेरणाओं का विश्लेषण करना इसका उद्देश्य |
  • कवि या लेखक की मन:स्थिति, सामाजिक परिस्थिति, उसका स्वभाव आदि बातों पर विचार करना |

3. तुलनात्मक आलोचना

  • तुलनात्मक मूल्य निर्धारण ही इसका उद्देश्य
  • एक ही प्रकार की विशेषताओं, नियमों और सिद्धांतों के प्रभाव को स्पष्ट करना |
  • हिंदी में इस प्रणाली का सूत्रपात का श्रेय पद्मसिंह शर्मा को है |

4. मार्क्सवादी आलोचना

  • उपयोगितावादी पक्ष पर अधिक बल देना |
  • उस वर्ण्य- विषय को महत्वपूर्ण मानना जो जनोपयोगी तथा जनवादी होता है |
  • सामाजिक या भौतिक यथार्थवाद को महत्त्व दिया जाता है |
  • रचना का मूल्यांकन बौद्धिक कसौटी पर करना |
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