Thursday 23 May 2024



आदिकाल की प्रवृत्तियाँ

आदिकाल में मुख्यरूप से रासो काव्यों की रचना हुई है अत: रासो साहित्य की प्रवृत्तियों को ही आदिकाल की प्रवृत्तियाँ कहना उचित है | ये प्रवृत्तियाँ इस प्रकार हैं –

1. डिंगल – पिंगल भाषा का प्रयोग

डिंगल इस काल की मुख्य भाषा
वीर रस के भावों को व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता वाली भाषा – डिंगल और पिंगल

डिंगल – अपभ्रंश व राजस्थानी भाषा का मिलाजुला रूप

पिंगल – अपभ्रंश व ब्रजभाषा के मेल से बनी भाषा

2. विविध छंदों व अलंकारों का प्रयोग

  • दोहा, गाथा, तोमर, तोटक, रोला, उल्लाला, कुंडलिया आदि छंदों का प्रयोग
  • चंदबरदाई छंदों के सम्राट और उनकी रचना छंदों का अजायबघर कहलाई
  • शब्दालंकार – अनुप्रास, यमक
  • अर्थालंकार – उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिश्योक्ति

3. काव्य के दो रूप

  • प्रबंध काव्य – रासो साहित्य
  • मुक्तक – अमीर खुसरो का काव्य, विद्यापति की पदावली

4. धार्मिक व लौकिक साहित्य

  • जैन साहित्य, सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य
  • लौकिक साहित्य में खुसरो व विद्यापति का काव्य
  • प्रकृति वर्णन – यद्यपि आलंबन व उद्दीपन दोनों रूपों का वर्णन परंतु प्रकृति वर्णन नीरस और सुस्त

5. ऐतिहासिकता का अभाव

  • रासो साहित्य के नायकों का ऐतिहासिक होना परंतु काव्य ग्रंथों में ऐतिहासिकता की रक्षा नहीं किया जाना |
  • ग्रंथों में तथ्यों की कमी व कल्पना की अधिकता
  • ग्रंथों की सामग्री का इतिहास से मेल न खाना
  • ऐतिहासिक तथ्य एवं सत्य का उद्घाटन न होना
  • कवियों द्वारा अतिश्योक्ति को प्रमुखता देते हुए काल्पनिक वर्णन

6. युद्धों का सजीव वर्णन

  • चारण कवियों द्वारा युद्धों को प्रत्यक्ष देखना
  • चारण कवियों का कलम के साथ – साथ तलवार का धनी होना
  • अवसर आने पर कवियों द्वारा स्वयं रण कौशल का प्रदर्शन करना
  • कवियों द्वारा योद्धाओं के सैन्य बल, उमंगों, मनोदशाओं एवं क्रियाकलापों का सुंदर वर्णन
  • वीर राजाओं को युद्ध हेतु प्रोत्साहित करना

7. प्रामाणिकता में संदेह

  • अधिकांश रासो कवियों की प्रामाणिकता संदिग्ध
  • खुमाण रासो और परमाल रासो की प्रामाणिकता में संदेह
  • प्रमुख रचना पृथ्वीराज रासो भी अप्रमाणित
  • अनेक प्रक्षिप्त अंशों को जोड़कर समय – समय पर काव्यों का परिवर्तित व परिवर्धित होते रहना

8. वीर एवं शृंगार रस की प्रधानता

  • युद्धों का वर्णन होने से वीर रस की प्रमुखता
जैसे – 
बारह बरस ले कुकुर जिए, तेरह जिए सियार
बरस अठारह छत्रिय जिए, आगे जीवन को धिक्कार

  • सुंदर राजकुमारियों से विवाह करने के निमित्त युद्ध लड़ा जाना
  • नख – शिख वर्णन करने में शृंगार रस का प्रयोग
  •  षटऋतु वर्णन

9. आश्रयदाताओं की प्रशंसा

  • कवियों द्वारा आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा में काव्य रचना करना अपना परम कर्त्तव्य समझना
  • राजाओं की वीरता का अतिश्योक्ति पूर्ण वर्णन
  • अधिकतर रचनाएँ प्रंशसापरक
  • साधारण जन – जीवन और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को भुला देना

10. संकुचित राष्ट्रीयता

  • स्वदेश अभियान एवं राष्ट्रीयता की भावना का अभाव
  • छोटे – छोटे राज्यों को ही राष्ट्र समझना, संपूर्ण भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखने की भावना का अभाव
  • विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध संगठित होकर युद्ध करने में सफल न होना |

11 कल्पना की प्रचुरता

  • रचनाओं में तथ्यों का अभाव
  • घटनाओं, नामावलियों एवं तिथियों की कल्पना करना
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