Wednesday 22 May 2024

 




भक्ति आंदोलन

नामकरण – मध्यकाल / भक्तिकाल

आचार्य रामचंद्र शुक्ल - समय – 1318 ई. – 1543 ई. तक

अधिकतर विद्वानों के अनुसार काल सीमा – चौदहवीं शती के मध्य से सत्रहवीं शती के मध्य तक

  • मध्‍यकालीन भारत के सांस्‍कृतिक इतिहास में भक्ति आन्दोलन एक महत्‍वपूर्ण पड़ाव था। इस काल में सामाजिक-धार्मिक सुधारकों द्वारा समाज में विभिन्न तरह से भगवान की भक्ति का प्रचार-प्रसार किया गया। सिख धर्म के उद्भव में भक्ति आन्दोलन की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
  • भक्ति आन्दोलन का आरम्भ दक्षिण भारत में आलवारों एवं नायनारों से हुआ जो कालान्तर में (800 ई से 1700 ई के बीच) उत्तर भारत सहित सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में फैल गया।
  • इस हिन्‍दू क्रांतिकारी अभियान के नेता शंकराचार्य थे जो एक महान विचारक और जाने माने दार्शनिक रहे। इस अभियान को चैतन्‍य महाप्रभु, नामदेव, तुकाराम, जयदेव ने और अधिक मुखरता प्रदान की। इस अभियान की प्रमुख उपलब्धि मूर्ति पूजा को समाप्‍त करना रहा।
  • भक्ति आंदोलन के नेता रामानन्द ने राम को भगवान के रूप में लेकर इसे केन्द्रित किया। उनके बारे में बहुत कम जानकारी है, परन्‍तु ऐसा माना जाता है कि वे 15वीं शताब्‍दी के प्रथमार्ध में रहे। उन्‍होंने सिखाया कि भगवान राम सर्वोच्‍च भगवान हैं और केवल उनके प्रति प्रेम और समर्पण के माध्‍यम से तथा उनके पवित्र नाम को बार-बार उच्‍चारित करने से ही मुक्ति पाई जाती है।
  • चैतन्‍य महाप्रभु सोलहवीं शताब्‍दी के दौरान बंगाल में हुए। भगवान के प्रति प्रेम भाव रखने के प्रबल समर्थक, भक्ति योग के प्रवर्तक, चैतन्‍य ने ईश्‍वर की आराधना श्रीकृष्‍ण के रूप में की।
  • श्री रामानुजाचार्य, भारतीय दर्शनशास्‍त्री थे। उन्‍हें सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण वैष्‍णव संत के रूप में मान्‍यता दी गई है। रामानंद ने उत्तर भारत में जो किया वही रामानुज ने दक्षिण भारत में किया। उन्‍होंने रुढिवादी कुविचार की बढ़ती औपचारिकता के विरुद्ध आवाज उठाई और प्रेम तथा समर्पण की नींव पर आधारित वैष्‍णव विचाराधारा के नए सम्‍प्रदाय की स्‍थापना की। उनका सर्वाधिक योगदान अपने मानने वालों के बीच जाति के भेदभाव को समाप्‍त करना था।
  • बारहवीं और तेरहवीं शताब्‍दी में भक्ति आन्दोलन के अनुयायियों में संत शिरोमणि रविदास, नामदेव और संत कबीर दास शामिल हैं, जिन्‍होंने अपनी रचनाओं के माध्‍यम से भगवान की स्‍तुति के भक्ति गीतों पर बल दिया।

भक्तिकाल में प्रचलित विभिन्न धर्म

1. शैव धर्म

  • मध्यकाल में पाशुपत, वीरशैव, लिंगायत और कश्मीरी शैव संप्रदाय विख्यात और उनके उपप्रदायों का गठन
  • शिव योगसाधना के प्रवर्तक तथा आदि गुरु
  • नाथ-योगी संप्रदाय की उपसंप्रदायों में गिनती

2. वैष्णव धर्म

  • मूलतः भक्तिप्रधान
  • पांचरात्र के माध्यम से तंत्र साधना के तत्व भी किसी न किसी रूप में इसमें समाविष्ट
  • पांचरात्र मत पर ही मूर्तिविधान और मंदिर निर्माण की व्यवस्था आधारित थी |
  • वैष्णव धर्म सम्प्रदायों और उपसंप्रदायों की सृष्टि प्रधानत: अनेक प्रवर्तकों द्वारा दार्शनिक सिद्धांतों की व्याख्या करने के कारण हुई |
  • द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत, भेदाभेद, शुद्धाद्वैत आदि इन्हीं के परिणाम थे |
  • समावत, सहजिया, वारकरी महानुभाव, पंचसखा आदि ऐसे संप्रदाय दार्शनिक सिद्धांत पर बल नहीं देते थे |

3. शाक्त धर्म

  • इसमें दक्षिणमार्गी और वाममार्गी नामक दो श्रेणियाँ
  • कबीर ने वाममार्गी शाक्तों के प्रति विरति और अनास्था प्रकट की
  • आगे चलकर इसमें अंधविश्वास ने स्थान पा लिया जिसमें भक्ति का मूलरूप धूमिल

4. श्रमण धर्म

  • बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म की गणना
  • जैनियों की तपोनिष्ठ नैतिक आचार पद्धति और बौद्धों के निर्वाण, शून्य तत्व, मध्यम मार्ग आदि का प्रभाव उन पर पड़ा
  • दोनों धर्मों में पुरातनपंथी परम्पराओं के प्रति असंतोष बढ़ने लगा
  • बौद्ध धर्म की महायान शाखा में विभिन्न यानों की वृद्धि होती गई |
  • मंत्रयान, व्रजयान, सहजयान और कालचक्रयान आदि उपसंप्रदाय इसी के परिणाम है |

5. इस्लाम धर्म

  • शरा और बेशरा दो प्रकार की कोटियाँ है
  • शरा सनातनी हैं और बेशरा मस्तमौला फ़कीर
  • बेशरा अपने क्रियाकलापों में इस्लाम के मूल सिद्धांत की उपेक्षा कर दिया करते थे
  • भारतीय सूफ़ी मुख्यत: बेशरा संप्रदाय के हैं, जो इस्लाम के अनुयायी होकर भी सनातनपंथी मुसलमानों से सब समय मेल नहीं खाते |

भक्तिकालीन साहित्यकारों द्वारा उठाये गये आन्दोलनकारी कदम

1. रूढ़ियों तथा आडम्बरों का विरोध –

  • सभी संतकवियों ने रूढ़ियों, मिथ्या आडम्बरों तथा अंधविश्वासों की कटु आलोचना की है |
  • तत्कालीन समाज की कुप्रवृत्तियों का कड़ा विरोध
  • व्रत, रोजा, नमाज, मूर्तिपूजा आदि विधानों का कड़ा विरोध करते हुए कहा गया –
“पत्थर पूजें हरि मिले तो मैं पूंजू पहार |
ताते वह चक्की भली, पीस खाय संसार ||”

2. आत्मसमर्पण की भावना -

संत एवं भक्ति साहित्य में सभी इतिहासकारों की मान्यता रही है ‘अहं’ या ‘मैं’ की भावना का त्याग न करना | तूलसी ने तो अपनी दास्य भक्ति में किसी प्रकार का अहं भाव नहीं रखा |

3. भजन तथा नाम की महत्ता पर बल

संत कवियों के अनुसार ईश्वर प्राप्ति के लिए भजन तथा नाम स्मरण को परमावश्यक माना है –

“सहजो सुमिरन कीजिए, हिरदै माहिं छिपाइ |
होठ – होठ सूँ न हिलै, सकै नहीं कोई पाइ ||”

4. गुरु की महत्ता पर बल – गुरु की महत्ता बताते हुए कबीर ने कहा –

“गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।

5. नारी के प्रति दृष्टिकोण – संत कवियों ने सती व पतिव्रता नारियों की प्रशंसा की है |

कबीर के अनुसार –
 “पतिव्रता मैली भली काली कुचित कुरूप |
पतिव्रता के रूप, वारौं कोटि सरूप |”


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